बाल कथा
बेईमान को मिली सजा
एक गांव में एक सोनार रहता था। बड़ा ही शरीफ, बड़ा ही नेक। सबका भला करने वाला। उसने अपने ईमान को ही अपनी दौलत बना रखी थी। उसी गांव में एक ध्रुत आदमी रहता था। उसकी इच्छा थी की कभी भी इस सोनार को बेवकूफ बना कर लूटा जाए। अपनी इसी चाल के चलते वह एक दिन सोनार के पास गया। सोनार से बोला की उसकी बीबी बहुत बीमार है। उसे कोई देखने वाला नहीं है। डाक्टर से ईलाज के लिए उसे कुछ पैसे चाहिए। इतना कहते ही ध्रुत व्यक्ति ने जेब से नकली सोने की चेन निकाली और सोनार को दे दी।
सोनार सीधा था मगर था तो सोनार ही। चेन देखते ही समझ गया कि यह तो नकली है। मगर, उसने सोचा की यह व्यक्ति इतनी मिन्नत कर रहा है तो हो सकता है कि इसकी पत्नी सच में काफी बीमार हो। तो क्यों ना इसे इस नकली सोने के बदले कुछ पैसा दे दें। सोनार ने अपने थैले से कुछ पैसे निकाली और उस व्यक्ति को दे दिए। पैसा लेते ही ध्रुत व्यक्ति तेजी से अपने घर की आेर चला। उसे लगा कि चलो आज तो सोनार को उल्लु बना लिया है। अब यह पैसे मेरे। जैसे ही वह घर पहुंचा तो देखता है कि उसकी पत्नी सच में बीमार हो गई। उसे उसके ईलाज के लिए अस्पताल लेकर जाना है। जितने पैसे उसके पास हैं वह उससे पत्नी का ईलाज नहीं करा सकता। एेसे में वह पैसों के इंतजाम के लिए आस पड़ोस के लोगों से पैसे मांगने शुरू कर दिए। मगर कोई भी व्यक्ति उस कपटी को पैसे देने को राजी नहीं हुआ। थकाहारा वह वापस अपने घर पहुंचा तो देखता है कि उसकी पत्नी घर पर नहीं है। बच्चे भी नहीं हैं। बड़ा परेशान वह पड़ोसियों से पूछता है तो पता चलता है कि उसकी पत्नी व बच्चे तो किसी सेठ के साथ अस्पताल गए हैं। वह भागा—भागा अस्पताल पहुंचता है तो देखता है कि उसकी पत्नी अस्पताल में भर्ती है और उसका ईलाज वही सोनार करा रहा है जिसे उसने ठगे थे। वह तुरंत सोनार के पैरों पर गिर पड़ता है। उससे अपने किए की माफी मांगता है। सोनार उसे बड़े प्यार से उठाता है और कहता है भाई कभी—कभी हमारे किए गए कर्मों की सजा बड़ी जल्दी भगवान हमें दे देता है।
यदि कमाना चाहते हो तो अपनी मेहनत और ईमानदारी के बल पर कमाआे।
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